रात ढल गई है समूची
और मै टहलते हुए सोचती हु
जैसे मेरे चहु ओर की दीवार
छण भर को ढह गई है
अकेली हु मै
मै नजरे ऊपर उठाती हु देखने को
तारो की चमक और मुस्कुराहट
लेकिन शनि,तारे तक नही मुस्कुराते
हल्की भीनी हवा
धरती के कण कण में धीमे से वहती है
और धुधला देती है सितारों को
और चाँद को ढक लेती है
मै ख़ुद में लोट आती हु
उसमे जो मेरे भीतर है
उसमे जो शायद मै नही हूँ उस धुधलके में
ख़ुद तक पहुचने के लिए बिलखती
क्या यही है सब कुछ
या इसके प्रे भी संसार है
सितारे चाँद ये रात मेरा कमरा मेरी दीवारे
और मै मेरा अकेलापन और मै ............
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
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