शनिवार, 18 अप्रैल 2009

राज की तुम/निकल आई है दुम.....

ये कविता मेरी लिखी नही है मुझे मेरे राज ने लिखकर दिया था की ये मैंने तुम्हारे लिए लिखी है अब तो वो किसी और का है फ़िर भी मेरे लिए तो अभी भी वो वही है ,

तुम ..........
तुम हमारी बंदना हो अर्चना हो तुम
प्यार के प्यासे हर्दय की साधना हो तुम
मै कवि हूँ तुम हो कविता कल्पना हो तुम
तुम रंगोली रंगपूरित अल्पना हो तुम
मै मरुस्थल तुम हो बरसा सींचना हो तुम
द्रस्य मै हूँ नाट्य तुम हो मंचना हो तुम
गीत मेरे गेव यदि हो गायिका हो तुम
मात्र रूपा प्रेयसी हो नायिका हो तुम
श्यामवर्णी मेघ मै सोदामिनी हो तुम
तडित चपला चंचला सी कामिनी हो तुम

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें